शारदीय नवरात्रि में हजारों श्रद्धालु कर रहे है माता का दर्शन पूजन
भभुआ/कैमूर(बंटी जायसवाल). बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ गांव में पवरा पहाड़ी पर मां मुंडेश्वरी का अतिप्राचीन मंदिर है. विश्व के प्राचीन मंदिरों में व देश के 51 शक्तिपीठों में इस मंदिर का नाम शुमार है. जिले के भगवानपुर प्रखंड के 608 फिट ऊंची पवरा पहाड़ी पर स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर में पूजा आदिकाल से होती आ रही है. इस मंदिर में अहिंसक व रक्तविहीन बलि की अनूठी प्रथा है. जो वर्षो से चली आ रही है. रक्तहीन बलि की अनूठी प्रथा विश्व के किसी भी मन्दिर में नहीं है.
कहा जाता है कि मां मुंडेश्वरी के इस मंदिर को मुगलकाल में मुगलशासक औरंगजेब द्वारा तोड़ने की कोशिश की गई थी. लेकिन वह विफल रही थी. औरंगजेब द्वारा मजदूरों से मंदिर तोडऩे के काम में भी लगाया गया था. लेकिन इस काम में लगे मजदूरों के साथ अनहोनी होने लगी. तब वे मंदिर को तोड़ने के काम छोड़ कर भाग गये थे. भग्न मूर्तियां व मंदिर के आस पास बिखरे अवशेष उस घटना की गवाही देती हैं. तब से इस मंदिर की चर्चा होने लगी।

नवरात्रि के अष्टमी को 1 लाख श्रद्धालुओं के दर्शन का दावा
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में इस वर्ष शारदीय नवरात्र में हजारों की संख्या में बिहार, यूपी, झारखंड के कई जिलों के श्रद्धालु भक्त पहुँच रहे है. जो मां मुंडेश्वरी के दरबार मत्था टेक कर पूजा अर्चना की जा रही है. धार्मिक न्यास परिषद ने इस बार नवरात्र के अष्टमी तिथि को 1 लाख श्रद्धालुओं ने दर्शन पूजन करने का दावा किया है. पूरे वर्ष श्रद्धालु भक्त आते रहते है. नवरात्रि, नव वर्ष, शिवरात्रि, रामनवमी आदि के मौके पर श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है. यहाँ पर बासंतिक व शारदीय नवरात्री में मेला भी लगता है. ऐसे मेला जैसा दृश्य तो हमेशा ही प्रतीत होता है.
तीर्थाटन व पर्यटन का जीवंत केंद्र है यह मंदिर
यहां पर अध्यात्म से जुड़े बहुत से रोचक तथ्य है. यह मंदिर बिहार के साथ साथ देश के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. माँ मुंडेश्वरी का मंदिर भगवानपुर अंचल के रामगढ़ गांव अंतर्गत पवरा पहाड़ी पर धरातल से 608 फीट की ऊँचाई पर स्थित है. यह प्राचीन मंदिर पुरातात्विक धरोहर ही नहीं, अपितु तीर्थाटन व पर्यटन का जीवंत केन्द्र भी है. इस मंदिर को कब और किसने बनाया, यह दावे के साथ कहना कठिन है.
बकरे के बलि की अनूठी प्रथा
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में बलि की अनूठी प्रथा है. यहा पर बगैर एक बूंद खून गिरे चावल के अक्षत व मंत्र से बकरे की बलि दी जाती है. लोगो का मानना है कि मन्नत पूरी होने पर लोग मनौती वाले पशु(बकरे)को लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं. मंदिर के पुजारी उस बकरे को मां के सामने खड़ा कर देता है. पुजारी मां के चरणों में चावल का अक्षत व पुष्प चढ़ा उसे पशु पर फेंकता है तो पशु बेहोश हो जाता है. तब मान ली जाती है कि बलि की प्रक्रिया पूरी हो गयी. इसके बाद उसे मनौती करने वाले श्रद्धालु को सौंप दिया जाता है.
शक्तिपीठ धाम में शामिल है माँ मुंडेश्वरी
मान्यता है कि मध्य युग में ही मां मुंडेश्वरी की उपासना शुरू हो गयी थी. मां मुंडेश्वरी धाम देश के प्राचीनतम शक्तिपीठों में से एक है. यहां मां मुंडेश्वरी के विभिन्न रूपों में पूजा की जाती है. पौराणिक व धार्मिक प्रधानता वाले इस मंदिर के मूल देवता हजारों वर्ष पूर्व नारायण अथवा विष्णु थे. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इस इलाके में अत्याचारी असुर मुंड रहता था. उस असुर से सभी लोग परेशान रहते थे. मां भगवती द्वारा उस अत्याचारी राक्षस का वध किया गया. तब से देवी का नाम मुंडेश्वरी पड़ गया.
मंदिर की प्राचीन इतिहास
मान्यता है कि माँ मुंडेश्ववरी का महत्व इस दृष्टि से और भी अधिक है कि यहाँ पर पूजा की परंपरा 1900 सालों से अविच्छिन्न चली आ रही है और आज भी यह मंदिर पूरी तरह जीवंत है. वर्ष के 365 दिन बड़ी संख्या में भक्तों का यहाँ आना-जाना लगा रहता है. यह मंदिर भारत का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है. मंदिर परिसर में विद्यमान शिलालेखों से इसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित होती है. 1838 से 1904 ई. के बीच कई ब्रिटिश विद्वान व पर्यटक यहाँ आए थे. प्रसिद्ध इतिहासकार फ्राँसिस बुकनन भी यहाँ आये थे. मंदिर का एक शिलालेख कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में है. पुरातत्वविदों के अनुसार यह शिलालेख 349 ई. से 636 ई. के बीच का है. इस मंदिर का उल्लेख कनिंघम ने भी अपनी पुस्तक में किया है. उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि कैमूर में मुंडेश्वरी पहाड़ी है, जहाँ मंदिर ध्वस्त रूप में विद्यमान है.
गडेरिये द्वारा चला था मन्दिर का पता
माना जाता है कि इस मंदिर का पता तब चला, जब कुछ गडरिये पहाड़ी के ऊपर अपने पशुओं को लेकर घास चराने गए थे तो उसी समय मंदिर के स्वरूप को देखा था. उस समय इसकी इतनी ख्याति नहीं थी, जितनी कि अब है. प्रारम्भ में पहाड़ी के नीचे निवास करने वाले लोग ही इस मंदिर में दीया जलाते और पूजा-अर्चना करते थे. यहाँ से प्राप्त शिलालेख में वर्णित तथ्यों के आधार पर कुछ लोगों द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि यह आरंभ में वैष्णव मंदिर रहा होगा, जो बाद में शैव मंदिर हो गया तथा उत्तर मध्ययुग में शाक्त विचारधारा के प्रभाव से शक्तिपीठ के रूप में परिणित हो गया. मंदिर की प्राचीनता का आभास यहाँ मिले महाराजा दुत्तगामनी की मुद्रा से भी होता है, जो बौद्ध साहित्य के अनुसार अनुराधापुर वंश का था और ईसा पूर्व 101-77 में श्रीलंका का शासक रहा था.
पंचमुखी महामंडलेश्वर महादेव भी इस मंदिर में
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग दिखाई देता है. मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह इसके निर्माण से अब तक कायम है. मंदिर के बाहर दक्षिण में नंदी स्थापित है. इसके साथ ही मंदिर के बाहर चारों तरफ मंदिर का ऊपरी हिस्सा का अवेशष बिखरा पड़ा हुआ है.
ऐसे पहुंचे मां मुंडेश्वरी मन्दिर तक
पवरा पहाड़ी के शिखर पर स्थित माँ के मंदिर तक पहुँचने के लिए दो तरह का रास्ता है. एक सड़क के माध्यम से जो पहाड़ी को काट कर बनाया गया है. दूसरा सीढ़ियों के द्वारा पैदल पहुँच सकते है. पहाड़ो को काट कर सीढियां व रेलिंग युक्त सड़क बनायी गयी है. सड़क मार्ग द्वारा कार, बोलेरो, स्कॉर्पियो, बाइक आदि वाहन से पहाड़ के ऊपर मंदिर तक पहुँच सकते है. मां मुंडेश्वरी मंदिर पहुचने का मार्ग सड़क मार्ग ही है. यहा का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन भभुआ रोड( मोहनियां) है. इसके बाद यहाँ से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 30 किमी की दुरी तय कर भभुआ, भगवानपुर होते हुए मुंडेश्वरी धाम तक पहुँच सकते है. यह गया - मुगलसराय रेलखंड से सम्बंधित है.
भभुआ/कैमूर(बंटी जायसवाल). बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ गांव में पवरा पहाड़ी पर मां मुंडेश्वरी का अतिप्राचीन मंदिर है. विश्व के प्राचीन मंदिरों में व देश के 51 शक्तिपीठों में इस मंदिर का नाम शुमार है. जिले के भगवानपुर प्रखंड के 608 फिट ऊंची पवरा पहाड़ी पर स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर में पूजा आदिकाल से होती आ रही है. इस मंदिर में अहिंसक व रक्तविहीन बलि की अनूठी प्रथा है. जो वर्षो से चली आ रही है. रक्तहीन बलि की अनूठी प्रथा विश्व के किसी भी मन्दिर में नहीं है.
कहा जाता है कि मां मुंडेश्वरी के इस मंदिर को मुगलकाल में मुगलशासक औरंगजेब द्वारा तोड़ने की कोशिश की गई थी. लेकिन वह विफल रही थी. औरंगजेब द्वारा मजदूरों से मंदिर तोडऩे के काम में भी लगाया गया था. लेकिन इस काम में लगे मजदूरों के साथ अनहोनी होने लगी. तब वे मंदिर को तोड़ने के काम छोड़ कर भाग गये थे. भग्न मूर्तियां व मंदिर के आस पास बिखरे अवशेष उस घटना की गवाही देती हैं. तब से इस मंदिर की चर्चा होने लगी।

नवरात्रि के अष्टमी को 1 लाख श्रद्धालुओं के दर्शन का दावा
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में इस वर्ष शारदीय नवरात्र में हजारों की संख्या में बिहार, यूपी, झारखंड के कई जिलों के श्रद्धालु भक्त पहुँच रहे है. जो मां मुंडेश्वरी के दरबार मत्था टेक कर पूजा अर्चना की जा रही है. धार्मिक न्यास परिषद ने इस बार नवरात्र के अष्टमी तिथि को 1 लाख श्रद्धालुओं ने दर्शन पूजन करने का दावा किया है. पूरे वर्ष श्रद्धालु भक्त आते रहते है. नवरात्रि, नव वर्ष, शिवरात्रि, रामनवमी आदि के मौके पर श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है. यहाँ पर बासंतिक व शारदीय नवरात्री में मेला भी लगता है. ऐसे मेला जैसा दृश्य तो हमेशा ही प्रतीत होता है.
तीर्थाटन व पर्यटन का जीवंत केंद्र है यह मंदिर
यहां पर अध्यात्म से जुड़े बहुत से रोचक तथ्य है. यह मंदिर बिहार के साथ साथ देश के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. माँ मुंडेश्वरी का मंदिर भगवानपुर अंचल के रामगढ़ गांव अंतर्गत पवरा पहाड़ी पर धरातल से 608 फीट की ऊँचाई पर स्थित है. यह प्राचीन मंदिर पुरातात्विक धरोहर ही नहीं, अपितु तीर्थाटन व पर्यटन का जीवंत केन्द्र भी है. इस मंदिर को कब और किसने बनाया, यह दावे के साथ कहना कठिन है.
- लेकिन यहाँ से प्राप्त शिलालेख के अनुसार माना जाता है कि उदय सेन नामक क्षत्रप के शासन काल में इसका निर्माण हुआ था. इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह मंदिर भारत के सर्वाधिक प्राचीन व सुंदर मंदिरों में एक है. यह मंदिर अष्टकोणीय है. भारत के 'पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग' द्वारा संरक्षित मुंडेश्वरी मंदिर के पुरुत्थान के लिए योजनायें बनाई जा रही है और इसके साथ ही इसे यूनेस्को की लिस्ट में भी शामिल करवाने के प्रयास जारी हैं. मंदिर को वर्ष 2007 में बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद ने अधिग्रहित किया गया.
बकरे के बलि की अनूठी प्रथा
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में बलि की अनूठी प्रथा है. यहा पर बगैर एक बूंद खून गिरे चावल के अक्षत व मंत्र से बकरे की बलि दी जाती है. लोगो का मानना है कि मन्नत पूरी होने पर लोग मनौती वाले पशु(बकरे)को लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं. मंदिर के पुजारी उस बकरे को मां के सामने खड़ा कर देता है. पुजारी मां के चरणों में चावल का अक्षत व पुष्प चढ़ा उसे पशु पर फेंकता है तो पशु बेहोश हो जाता है. तब मान ली जाती है कि बलि की प्रक्रिया पूरी हो गयी. इसके बाद उसे मनौती करने वाले श्रद्धालु को सौंप दिया जाता है.
शक्तिपीठ धाम में शामिल है माँ मुंडेश्वरी
मान्यता है कि मध्य युग में ही मां मुंडेश्वरी की उपासना शुरू हो गयी थी. मां मुंडेश्वरी धाम देश के प्राचीनतम शक्तिपीठों में से एक है. यहां मां मुंडेश्वरी के विभिन्न रूपों में पूजा की जाती है. पौराणिक व धार्मिक प्रधानता वाले इस मंदिर के मूल देवता हजारों वर्ष पूर्व नारायण अथवा विष्णु थे. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इस इलाके में अत्याचारी असुर मुंड रहता था. उस असुर से सभी लोग परेशान रहते थे. मां भगवती द्वारा उस अत्याचारी राक्षस का वध किया गया. तब से देवी का नाम मुंडेश्वरी पड़ गया.
मंदिर की प्राचीन इतिहास
गडेरिये द्वारा चला था मन्दिर का पता
माना जाता है कि इस मंदिर का पता तब चला, जब कुछ गडरिये पहाड़ी के ऊपर अपने पशुओं को लेकर घास चराने गए थे तो उसी समय मंदिर के स्वरूप को देखा था. उस समय इसकी इतनी ख्याति नहीं थी, जितनी कि अब है. प्रारम्भ में पहाड़ी के नीचे निवास करने वाले लोग ही इस मंदिर में दीया जलाते और पूजा-अर्चना करते थे. यहाँ से प्राप्त शिलालेख में वर्णित तथ्यों के आधार पर कुछ लोगों द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि यह आरंभ में वैष्णव मंदिर रहा होगा, जो बाद में शैव मंदिर हो गया तथा उत्तर मध्ययुग में शाक्त विचारधारा के प्रभाव से शक्तिपीठ के रूप में परिणित हो गया. मंदिर की प्राचीनता का आभास यहाँ मिले महाराजा दुत्तगामनी की मुद्रा से भी होता है, जो बौद्ध साहित्य के अनुसार अनुराधापुर वंश का था और ईसा पूर्व 101-77 में श्रीलंका का शासक रहा था.
पंचमुखी महामंडलेश्वर महादेव भी इस मंदिर में
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग दिखाई देता है. मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह इसके निर्माण से अब तक कायम है. मंदिर के बाहर दक्षिण में नंदी स्थापित है. इसके साथ ही मंदिर के बाहर चारों तरफ मंदिर का ऊपरी हिस्सा का अवेशष बिखरा पड़ा हुआ है.
ऐसे पहुंचे मां मुंडेश्वरी मन्दिर तक
पवरा पहाड़ी के शिखर पर स्थित माँ के मंदिर तक पहुँचने के लिए दो तरह का रास्ता है. एक सड़क के माध्यम से जो पहाड़ी को काट कर बनाया गया है. दूसरा सीढ़ियों के द्वारा पैदल पहुँच सकते है. पहाड़ो को काट कर सीढियां व रेलिंग युक्त सड़क बनायी गयी है. सड़क मार्ग द्वारा कार, बोलेरो, स्कॉर्पियो, बाइक आदि वाहन से पहाड़ के ऊपर मंदिर तक पहुँच सकते है. मां मुंडेश्वरी मंदिर पहुचने का मार्ग सड़क मार्ग ही है. यहा का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन भभुआ रोड( मोहनियां) है. इसके बाद यहाँ से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 30 किमी की दुरी तय कर भभुआ, भगवानपुर होते हुए मुंडेश्वरी धाम तक पहुँच सकते है. यह गया - मुगलसराय रेलखंड से सम्बंधित है.








