#कैमूर की पहाड़ियों में बना है यह किला, बाहर से नहीं दिखता है यह किला
#इस किले के अंदर है सैकड़ो तहखाने और सुरंगों का बिछा है जाल
#इसी किले के सुरंगों से शेरशाह हमेशा आता जाता था, लेकिन नहीं था किसी को सुरंगों के बारे में पता
भभुआ/कैमूर लाइव न्यूज़(बंटी जायसवाल)।
भभुआ/कैमूर लाइव न्यूज़(बंटी जायसवाल)।
बिहार के रोहतास जिले में कैमूर की पहाड़ियों में भारतीय शासक शेरशाह सूरी का किला है. जिसे ‘शेरगढ़ का किला’ कहा जाता है. जहां पर सरकार की नजरें इनायत नहीं हुई. जिसके कारण यह किला संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है. कहा जाता है कि 500 साल पुराने इस किले में शेरशाह का शाही बेशकीमती खजाना दबा हुआ है. आज तक इस खजाने के बारे में किसी को पता नहीं चल पाया. इस किले में सैकड़ों सुरंग और तहखाने हैं. यह किला बाहर से नहीं दिखता है कि यह किला है इसे सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनवाया गया था. इस किले के तहखाने इतने बड़े हैं कि उनमें एक साथ 10 हजार लोग आ सकते हैं. कहा जाता है कि इस किले के ऊपर से देखने पर 10 किमी की दूरी तक देखा जा सकता है. इसलिए तो शेरशाह के हजारों सैनिक रहा करते थे. जहां से दुश्मनों को आराम से देख सकें. इस किले को दुश्मनों से खुद की सुरक्षा के लिए बनवाया था. लेकिन मुगल शासक हुमायूं ने शेरशाह सूरी के हजारों सैनिकों का खूनी नरसंहार हुआ था. क्योंकि इस किले में सैकड़ों सुरंगे है लेकिन सुरंगों के रास्ते के बारे में शेरशाह व उनके कुछ खास लोगों को ही इसके रास्ते के बारे में जानकारी था. जब मुगलो द्वारा इस किले पर हमला किया गया था तो हजारों सैनिक सुरंगों से रास्ते से निकलने जानकारी नहीं होने के कारण इसी तहखाने में फंसा कर मार डाला था. तब से यह किला अभिशप्त हो गया है. यहां पर काफी डरावना से प्रतित होता है. इसीलिए लोग इस किले तक अकेले नहीं पहुँच सकते है.
यह है शेरगढ किले का इतिहास
इस किले का इतिहास के बारे में कहीं ठोस प्रमाण नहीं मिल पाता है. इतिहासकारों द्वारा समय समय कई बातें इस किले के बारे में कही गयी है. कुछ इतिहासकारों द्वारा कहा गया है कि इस किले पर पहले राजपूत राजा शाहबाद का राज था. कुछ इतिहासकारों के अनुसार, शेरशाह के पहले यहां खरवार राजाओं का शासन था. खरवार राजा गजपति सिंह ने शेरशाह के अच्छे मित्र होने के कारण इस किले तोहफे में दिया गया था. पहले इस किले को भुड़कुड़ा का किला कहा जाता था. अब वर्तमान में शेरगढ के किले के नाम से जाना जाता है.
1540 से 1545 ई के बीच शेरशाह का रहा शासन
ऐसा भी कहा जाता है कि रोहतास किले पर कब्जा करने के बाद शेरशाह की इस किले पर नजर पड़ी और इसे भी शेरशाह ने अपने अधीन कर लिया था. इसे नवाबगढ़ भी कहा जाता था. इस किले पर 1540 से 1545 के बीच शेरशाह का शासन रहा है. 1576 में इस किले पर मुगलों ने हमला करने व हजारो सैनिकों के नरसंहार के बाद यह किला मुगलों के हाथों में चला गया.जब मुगलों द्वारा शेरशाह के हजारों सैनिकों का नरसंहार किया था. इसके बाद से इस किले पर किसी का शासन नहीं हुआ. बाद यह किला अभिशप्त और परित्यक्त हो गया.
दुश्मनों से सुरक्षा के लिए बनाया गया था यह किला
बिहार के सासाराम में कैमूर की पहाड़ियों में बना मौजूद शेरगढ़ का किला इस तरह बनाया गया है कि बाहर से किसी को नहीं दिखता. ये चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा है. इस किले के दक्षिण में यानी इस किले के पीछे में दुर्गावती नदी और वर्तमान में दुर्गावती जलाशय है. बाकी तरफ से ये जंगलों से घिरा हुआ है. यहां सुरंगों का जाल बिछा है. यहां के तहखाने इतने बड़े हैं कि उनमें 10 हजार तक सैनिक आ सकते हैं. इस किला अपने दुश्मनों से बचने और सुरक्षित रहने के लिए बनवाया था. कहा जाता है कि शेरशाह अपने परिवार और सैनिकों के साथ यहीं रहते थे. इसी किले के अंदर सुरंगों से शेरशाह का आना जाना होता था. यहां उनके लिए सभी सुविधाएं किले के अंदर ही मौजूद थी. यहां के कमरे भी सुरक्षा के हिसाब से बनाए गये है. किले से हर दिशा में 10 किमी तक दूर से दुश्मनों को आते हुए देखा जा सकता था. यहां मौजूद तहखानों में काफी दिनों के लिए खाना और पानी स्टोर किया जा सकता था.
शेरगढ़ किले का यह है रहस्य
इस किले में इतनी सुरंगे है और कहां तक जाती है इसका आज तक किसी को भी पता नहीं चल पाया है. इसके साथ ही कहा जाता है कि शेरशाह का शाही खजाना भी यही पर दबा पड़ा हुआ है. शेरशाह और उसके खास लोगों को ही उस खजाने के बारे में जानकारी था. लेकिन आज तक इन सुरंगों और खजानों के बारे में किसी को पता नहीं चला जो आज भी रहस्य और राज बन कर रह गया है.
सुरंगों में मुगलों ने किया था नरसंहार
शेरशाह के 1540-1545 ई.वीं के शासन के दौरान इस किले में हजारों सैनिक व शेरशाह के परिवार रहता था. कहा जाता है कि शेरशाह ने मुगल शासक हुमायूं को पराजित कर 1540 में दिल्ली की गद्दी पर बैठा था. इसके बाद जब मुगलों को इस किले के बारे में पता चला, उन्होंने इसपर हमला कर दिया. मुगल शासक हुमायूं ने शेरशाह के परिवार के सदस्यों व सैनिकों को किले में मार कर किले के नीचे से बहती दुर्गावती नदी में फेंकवा दिया था. वही हजारों सैनिकों को किले के अंदर ही सुरंगो व तहखानों के अंदर में मार डाला था. क्योंकि सैनिकों को सुरंगों का राज नहीं पता था और मुगलों ने उन्हें निकलने का मौका नहीं दिया. इस बड़े नरसंहार के बाद से इस महल में कोई नहीं रहा.आज भी लोग इस किले पर अकेले जाने से डरते हैं.
3 किमी की दूरी में फैला है शेरगढ़ किला का क्षेत्र
बताया जाता है कैमूर की पहाड़ियों में बना शेरगढ़ का किला क्षेत्र तीन किमी की दूरी में फैला हुआ है. इतिहासकारों के अनुसार, जब ब्रिटिश इतिहासकार फ्रांसिस बुकानन 1813 में इस शेरगढ़ किले के इतिहास के बारे में जानने आया था तो उस समय इस किले के सिंहद्वार के ऊपर आठ बुर्जियां थीं, जिनमें से आज मात्र पांच बुर्जियां बची हैं. इस किले के सिंहद्वार से दक्षिण की ओर रास्ता जाता है जो मुख्य महल की ओर जाता है. इस किले तक पहुँचने का रास्ता बड़ी कठिन है. लंबी दूरी और ऊंची पहाड़ी उबड़-खाबड़ रास्ता जंगल व कंटिली झाड़ियों से भरा पड़ा हैं. सिंहद्वार से लगभग एक किमी दूर दक्षिण में दूसरी पहाड़ी है. जिसके रास्ते में ही एक तालाब बना हुआ है. जिसे रानी पोखरा के नाम से जाना जाता है. अब वह भी ध्वस्त हो चुका है. उसका अवशेष बचा हुआ है.
दूसरे सिंहद्वार से कुछ दूरी पर रास्ते में है भूमिगत कुँआ
वही पहला सिंहद्वार से किला से दो किमी की दूरी तय कर अंदर जाने पर दूसरी पहाड़ी पर मुख्य महल है. इसके चारों तरफ प्राचीर से घिरी है. इसके अंदर मुख्य महल है. प्राचीर के दरवाजा तक जाने के लिए सीढि़यां बनी हैं. दरवाजा अब गिरने की स्थिति में है. प्राचीर के भीतर दरवाजा के दोनों ओर दो खुले दालान हैं. कुछ दूर जाने पर भूमिगत गोलाकार कुआं है. जहां इस कुँए से पानी पीने व स्नान करने का काम में लिया जाता था. अब भी कुँआ उसी तरह है. भूमिगत कुएं से पूरब में चार मेहराब बनाते खंभों पर टिका चौकोर तह़खाना है.इस तह़खाने से पश्चिम-उत्तर में एक विशाल महल के ध्वंसावशेष बिखरे हैं. इसमें बड़े बड़े पेड़ झाड़ियां उग आयी है.
ऐतिहासिक और अनुपम कलाकृतियां हो रही ध्वस्त
शेरशाह का किला जो शेरगढ़ के नाम से विख्यात है, संरक्षण के अभाव में अस्तित्व की जंग लड़ रहा है.
जिन भूमिगत कमरों के लिये यह किला मध्यकालीन इतिहास के लेखकों के लिए कौतुहल का केन्द्र रहा. जिसे इतिहासकारों ने जी भरकर सराहा है. शेरगढ़ किला के मुख्य महल व तहखानों के ध्वस्त होने के बाद पेड़ व झाड़ झंखाड़ उग आए है. ऐतिहासिक और अनुपम कलाकृति वाला किला दिनों दिन अपनी संरक्षण के अभाव अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. अगर सरकार और पुरात्व विभाग द्वारा इस किले पर अब भी ध्यान नहीं गया तो जमींदोज होकर रह जाएगा.
यहां पर पर्यटन की अपार संभावनाएं
कैमूर की पहाड़ी पर शेरगढ़ का किला स्थित है. यह किला लगभग 6 वर्ग मील क्षेत्रफल में फैला हुआ है. शेरगढ़ किला के बगल से दुर्गावती नदी बहती है. इसके नीचे ही दुर्गावती जलाशय परियोजना का विशाल बांध बना हुआ है. यहीं से गुप्ताधाम और सीताकुंड के लिए रास्ता भी जाता है. पर्यटन की यहां पर अपार संभावनाएं हैं. फिर भी इस महत्वपूर्ण धरोहर के रखरखाव का जिम्मा न तो केंद्र सरकार के पुरातत्व विभाग के पास है, न ही राज्य सरकार के पास है. इसी कारण यह शेरगढ़ का किला खंडहर में तब्दील होता जा रहा है.
कैमूर की पहाड़ी पर शेरगढ़ का किला स्थित है. यह किला लगभग 6 वर्ग मील क्षेत्रफल में फैला हुआ है. शेरगढ़ किला के बगल से दुर्गावती नदी बहती है. इसके नीचे ही दुर्गावती जलाशय परियोजना का विशाल बांध बना हुआ है. यहीं से गुप्ताधाम और सीताकुंड के लिए रास्ता भी जाता है. पर्यटन की यहां पर अपार संभावनाएं हैं. फिर भी इस महत्वपूर्ण धरोहर के रखरखाव का जिम्मा न तो केंद्र सरकार के पुरातत्व विभाग के पास है, न ही राज्य सरकार के पास है. इसी कारण यह शेरगढ़ का किला खंडहर में तब्दील होता जा रहा है.
क्या कहते है इतिहासकार
रोहतास के इतिहासकार व शोधकर्ता डॉ.श्याम सुन्दर तिवारी बताते है कि वर्तमान शेरगढ़ किला को पहले बादलगढ़ का किला व भुरकुड़ा का किला के नाम से जाना जाता था. उसका उल्लेख मध्यकालीन इतिहास की पुस्तकों तारी़ख-ए-शेरशाही और 'तबकात-ए-अक़बरी' में मिलता है. खरवार राजाओं ने अपने किले को रोहतासगढ़ की ही तरह अति प्राचीन काल में बनवाया था. इस किले को खरवार राजा गजपति सिंह ने शेरशाह को दोस्ती के तोहफे के रूप में दिया था. इतिहासकार फ्रांसिस बुकानन के अनुसार, यहां भारी नरसंहार हुआ था. इसी कारण यह किला अभिशप्त और परित्यक्त हो गया.
रोहतास के इतिहासकार व शोधकर्ता डॉ.श्याम सुन्दर तिवारी बताते है कि वर्तमान शेरगढ़ किला को पहले बादलगढ़ का किला व भुरकुड़ा का किला के नाम से जाना जाता था. उसका उल्लेख मध्यकालीन इतिहास की पुस्तकों तारी़ख-ए-शेरशाही और 'तबकात-ए-अक़बरी' में मिलता है. खरवार राजाओं ने अपने किले को रोहतासगढ़ की ही तरह अति प्राचीन काल में बनवाया था. इस किले को खरवार राजा गजपति सिंह ने शेरशाह को दोस्ती के तोहफे के रूप में दिया था. इतिहासकार फ्रांसिस बुकानन के अनुसार, यहां भारी नरसंहार हुआ था. इसी कारण यह किला अभिशप्त और परित्यक्त हो गया.
इसी किले में चंद्रकांता का वर्णन मिलता है
हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री ने इस किले में चंद्रकांता के संतति के काल्पनिक कहानियों का वर्णन किया है. जिसमें में चंद्रकांता के अईयारियों व तिलिस्म का चर्चा है. इसमें बादलगढ़ के किले, सुरंगो व तहखानों को कहानियों को ताना बाना बुना गया है. क्योंकि चंद्रकांता सन्तति काल्पनिक कहानी से शेरगढ़ किला का मालूम पड़ता है.
डरावना लगता है किला के तहखाने
शेरगढ के किले के तहखानों व सुरंगों में शेरशाह के परिवार व सैनिकों को मुगलों द्वारा कत्लेआम और खूनी नरसंहार किया गया था. शेरगढ़ के इस किले व तहखानों व सुरंगों को दुश्मन सैनिकों को भुलभुलैया में फंसाने के लिए बनाया गया था.लेकिन शेरशाह के परिवार व हजारों सैनिक हुमायूं के आक्रमण के दौरान अपने ही बनाये गए भुलभुलैया में फंस कर मार दिए गए. जिसके बाद यह किला अभिशप्त हो गया.यहां पर लोग आने से कतराते है. स्थानीय लोग बताते है कि इस किले से अजीब अजीब आवाजें निकलती है. लोग इस किले के तहखानों में नहीं जाना चाहता है. दिन में भी डरावना लगता है.
कैसे पहुँचे शेरगढ़ किले तक
बिहार के रोहतास जिले के सासाराम मुख्यालय से 45- 50 किमी की दूरी पर चेनारी प्रखंड मुख्यालय दक्षिण-पश्चिम में चलने पर लगभग 12 किमी की दूरी पर दुर्गावती जलाशय डैम है. जहां से बगल से शेरगढ़ किला तक रास्ता जाता है. लगभग 700-800 फीट ऊँचाई पर शेरगढ़ का किला स्थित है.



