# नवरात्रि में लगती है मेला, भूत प्रेत से पीड़ित व असाध्य मरीजो का होता है इलाज
# निःसन्तान भी संतान के लिए मांगते है बाबा से मन्नते, होती है पूरी कैमूर लाइव न्यूज़ से बंटी जायसवाल की स्पेशल रिपोर्ट
भभुआ कैमूर ब्यूरो। एक ऐसा धाम जहां भूत प्रेत की आत्माओं से पीड़ितो को नवरात्रि में इलाज होता है। यहां पर शारदीय नवरात्रि में भूत प्रेत व असाध्य रोगियों का मेला लगता है। हम बात कर रहे है बिहार के कैमूर जिले के चैनपुर के पुराने किले में स्थित हरसू ब्रह्म धाम के बारे में। यह धाम भूत-प्रेत और असाध्य रोगों से पीड़ित लोगो के लिए सुप्रीम कोर्ट यानी सर्वोच्च न्यायालय की तरह माना जाता है। प्रतिवर्ष यहां पर नवरात्रि व अन्य दिन हजारो की संख्या में भारत तथा अन्य देशों के लोग भूत-प्रेत तथा असाध्य रोगों से छुटकारा पाने के लिए पहुचते है। ख़ास कर शारदीय नवरात्रि में काफी भीड़ लगती है। निःसंतान दंपति भी काफी संख्या में आते है। विश्वास है कि बाबा अपने दरबार में सच्चे मन से अरदास लगाने वाले हर पीड़ित की मनौती पूरी करते हैं।
# कौन थे हरसू बाबा
लोगो के अनुसार हरसू पाण्डेय सकरवार वंशी चैनपुर के राजा शालिवाहन के प्रधान मंत्री तथा राजपुरोहित थे। राजा द्वारा किये गए अपमान से क्षुव्ध होकर उन्होंने आमरण अनशन कर किले में हीं प्राण त्याग दिये। यह घटना जनवरी 1428 ई० में हुयी मानी जाती हैं। मृत्यु के बाद बाबा शक्तिशाली ब्रह्म हो गए और उन्होंने राजा, उनके परिवार और राज्य को नष्ट कर दिया। दूसरी प्रचलित कथा में माना जाता हैं कि राजा द्वारा किए गए अपमान से क्षुव्ध बाबा तत्कालीन दिल्ली सल्तनत के सुलतान अलाउदिन खिलजी से सम्पर्क किया। उनकी प्रेरणा से खिलजी ने राजा पर आक्रमण किया। राजा शालिवाहन युद्ध में मारे गए और शत्रु सेना ने किले को ध्वस्त कर सकरवार वंशी राज्य का अन्त कर दिया। इसके बाद चैनपुर राज्य मुस्लिम सुलतानों के अधिन हो गया। राजा शालिवाहन की रानी ने बाबा की मृत्यु के स्थान पर उनका मंदिर निर्मित करा दिया।
# रोग व्याधियां होती है दूर
यहां लगभग पांच शताब्दियों से हरसू ब्रह्म बाबा वहां पहुचने वाले श्रद्धालुओं की शारीरीक मानसिक व्याधियां दूर करते है। निःसंतानों को संतान देते है , ऐसी मान्यता है। वैसे तो सालो भर यहां भूत-प्रेत बाधा ग्रस्त एवं संतान कामना से लोग आते रहते है। लेकिन पवित्र नवरात्रियों तथा सावन महिने में यह संख्या लाखों में पहुच जाती है। मनौती पूरी होने पर बाबा को खड़ाउ जनेउ तथा मिठाई चढ़ाई जाती है।# भूत प्रेत को गिरफ्तार कर दी जाती है कठोर सजा व मृत्यु दंड
धाम के पुजारी खानदान के राजकेश्वर त्रिपाठी चैनपुरी बताते हैं कि बाबा भूत-प्रेत और पारलौकिक शक्तियों से प्रभावित लोगो के लिए सुप्रीम कोर्ट के समान हैं। यहां प्रबल से प्रबल प्रेत को गिरफ्तार कर कठोर सजा यहॉ तक कि मृत्यु दण्ड भी दिया जाता है और पीड़ित सदा के लिए स्वस्थ हो जाता है।
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# कैसे पहुँचे
हरसू ब्रह्म का यह अनूठा दरबार जिला मुख्यालय
भभुआ से 12 किमी की दूरी पर चैनपुर किले में स्थित है। यहां पहुचने के लिए वाराणसी, मुगलसराय, गया सासाराम आदि स्थानों से नियमित बस एवं रेल सेवा उपलब्ध है। पारलौकिक शक्तियों में रूचि रखने वाले लोगों के लिए इस धाम में भूतों को सम्मन, उनकी गिरफ्तारी और दंडित किये जाने की रोचक प्रक्रिया अवश्य देखनी चाहिए। धाम का प्रबंधन बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के अधीन है। श्रद्धालुओं एवं पर्यटको के विश्राम हेतु भभुआ में अच्छे वातानुकूलित होटल एवं धर्मशाला उपलब्ध हैं।
# माघ नौमी को मनाया जाता है बाबा की जयंती-
हर वर्ष राजा शालिवाहन के गुरु महापंडित हरसू ब्रह्म बाबा की जयंती माघ शुक्ल पक्ष के नवमी तिथि को मनाई जाती है. इसमें केवल हरसू ब्रह्म बाबा के वंशज सम्मिलित होते हैं. पिछले बीस वर्षों से उनकी जयंती मनाई जा रहीं है। इस अवसर पर 24 घंटे का अखण्ड अष्टयाम भी होता है. पुरे दिन लाखों श्रद्धालुओं द्वारा दर्शन पूजन किया गया इसके बाद देर शाम मंदिर का गर्भगृह आम लोगों का प्रवेश रोक बाबा के वंशजों उनकी विधिवत पूजा की गयी एवं शुद्ध घी से बने प्रसाद चढ़ाए गए. मध्य रात्रि तक चले इस पूजा के दौरान मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालु मौजूद रहे. देर रात बाबा के गुरु घराने से आए बाबा के पुरोहित द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ बाबा की पूजा की गयी जिसके बाद मंदिर के पुजारी जयदेव त्रिपाठी द्वारा बाबा की आरती की गयी. आदि अनादि काल से धर्मए संस्कृति व आस्था भाव से परिपूर्ण भारत देश में सनातन देवी देवताओं के अलावा कितने ही लोक देवी देवताओं की पूजा की जाती है.
कहीं ये डाक बाबाए कहीं ये गोलू देवताए कहीं बालाजीए कहीं डिहवार बाबाए कहीं गोरैया तो कहीं ब्रह्म देवता के रूप में पूजित हैं. ब्रह्म देवता को बरम बाबा भी कहा जाता है. ऐसे तो पूरे देश में ब्रह्म देवता के कितने ही स्थान हैं पर इनमें बिहार राज्य के कैमूर पर्वत के आँचल में विराजमान जिला मुख्यालय भभुआ से दस लिलामीटर पश्चिम चैनपुर के हरसू ब्रह्म का अपना विशिष्ट महत्व है जिनकी कृपा से मानव जनित तमाम प्रकार की बाधाएं और देव श्राप का शमन.दमन शीघ्र हो जाता है। कार्य संचालन में दक्ष थे. प्राप्त विवरण के मुताबिक हरसू पाण्डेय भभुआ प्रखण्ड के जमुआंव के निवासी थे जो चैनपुर से 15 कि.मी. उत्तर की ओर है. ऐेसे इनके पुरोहित का खानदान अजगरा (उ.प्र.) में निवासरत् है जो हरेक वर्ष वार्षिक महोत्सव में अवश्य आते हैं. राज शरीवाहन का राठौर राजपूत सुंदरी मानिकमति से विवाह के बाद राजा के नाम, यश व गुण की चर्चा सर्वत्र होने लगी. आगे 1805 ई. में राज्य के विकास व जनता के उत्थान हेतु राजा ने विष्णु यज्ञ किया और अपने राजकीय क्षेत्र के सभी ब्राह्मणों को यथा उचित सम्मान दिया. इस कार्य में श्री हरसू पाण्डेय का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ जो राजमहल के ठीक सामने ही विशाल भवन में रहा करते थे.
विवाह के तीस साल गुजर जाने पर भी जब राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हुई। तब यह राजा ही नहीं प्रजा के लिए भी चिंता की बात थी. हरसू पाण्डेय ने भी ज्योतिष के आधार पर बताया कि राजन आपको इस पत्नी से पुत्र योग अपूर्ण रहेगा इस कारण आप दूसरा विवाह कर लें तब वंशवृद्धि अवश्य होगी. जब महारानी ने यह सब जाना तो उन्हें अपार कष्ट हुआ कि हरसू पाण्डेय के प्रभाव में आकर राजा उसकी उपेक्षा कर रहे हैं. रानी ने अंत में कह ही दिया कि मुझे आपका पुनर्विवाह स्वीकार नहीं. अब राजा करें भी तो क्या? अंत में राजा ने श्री हरसू पाण्डेय की सहायता से सरगुजा (छतटीसगढ़) की राजकुमारी ज्ञानकुंअर से काशी में चुपचाप शादी कर ली जो राजा भानुदेव सिंह की पुत्री थी. काशी में ही नया भवन बनाकर इनकी व्यवस्था की गई. इधर रानी को जब यह मालूम हुआ उसने चाल चलकर छोटी रानी को भी यहीं राजमहल में बुला लिया. अब दोनों रानी साथ रहतीं पर बड़ी रानी को हमेशा राजा से बदला लेने का भाव बलवती रहा. जब छोटी रानी के आगमन का उत्सव राजमहल सहित पूरे राज्य में मनाया जा रहा था तभी बड़ी रानी ने घोषणा करते हुए कहा कि अब इस राज्य की वास्तविक महारानी ज्ञानकुंर ही रहेंगी और आज से मेरा कार्य राजा को प्रशासनिक सहयोग देना है. राजा रानी के इस त्याग को जान सुनकर सन्न रह गया और उसने भी तत्क्षण घोषणा की कि बगैर बड़ी महारानी की राय विचार के वे कोई कार्य नहीं करेंगे. दिन गुजर रहा था पर एक रात बड़ी महारानी ने राजा को हरसू ब्रह्म के महल की ओर इशारा किया कि कैसे आप राजा और कैसा आपका राज्य है जहां राजा से ऊंचे भवन में राजपुरोहित का दीप रातभर जलता रहता है. राजा ऊँचा है अथवा राजपुरोहित. राजा ने समझाया- ऐसा मत सोच प्रिय हरसू अपना राजकीय पुरोहित ही नहीं समस्त कार्य का मतिदाता व सहायक है पर रानी के मन में तो बदले की भावना अभी तक बनी थी.
उसने याद दिलाया कि आप तो वचन दे चुके हैं कि मेरी राय की अवहेलना नहीं करेंगे. तो चलिए उसके भवन में ऊपर दीप आज से नहीं जले- भला राजा के भवन से ऊंचा पुरोहित का भवन होगा ! राजा वचन हार कर रानी की बातों में आ गया. जैसे ही राजा का काफिला हरसू पाण्डेय की भवन तक पहुंचा अनुभवी हरसू सब जान समझ गये. अपने इष्ट देव का स्मरण किया रक्षा की गुहार लगाई फिर क्या था ब्रह्म देवता के परम उपासक हरसू पाण्डेय की रक्षा अदृश्य रूप में ब्रह्म शक्ति करने लगी. सम्पूर्ण राज्य में हाहाकार मच गया। देखते-देखते विशाल राजप्रासाद ढेर हो गया. राजा-रानी सभी डर गये. छोटी रानी गर्भ से थी इस कारण उन्हें नैहर भेज दिया गया. हरसू पाण्डेय ऐसा करने के बाद बड़े दुखी हुए और उन्होंने अनशन प्रारंभ कर दिया. अनशन के 21वें दिन मध्याह्न में संवत् 1484 माघ शुक्ल नवमी भौमवार को अपना शरीर त्याग करने के उपरांत सूक्ष्म शरीर धारण कर हरसू पाण्डेय से हरसू ब्रह्म बन गये. इनकी मृत्यु के बाद इनके अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी पर एक जोरदार आवाज के साथ ही शरीर पिंड रूप में परिवर्तित हो गया. यही पिंड आज हरसू ब्रह्म स्थान के मूल पूजन क्षेत्र में पूजित है जिसे आयु फलदाता स्वीकारा जाता है. इस क्षेत्र में हरसू ब्रह्म से संबद्ध और भी कुछ देवस्थल पूजित हैं जो ‘ब्रह्म’ देवता के ही हैं पर इन सबों के बीच हरसू बाबा का स्थान बड़ा ही महिमाकारी है. प्रत्येक वर्ष को माघ नौमी के अवसर पर हरसू बाबा की पूण्य तिथि व जन्मोत्सव दोनों मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन इन्होंने अपना देह त्याग किया और ब्रह्म रूप धारण किया था.

