क्या जाती वही होती, जो आते जाते भी नहीं जाती ? जानिए कौन सी है वह वस्तु, पढ़े खबर

पवन जायसवाल/ चेनारी/ रोहतास
फोटो:-  प्रवचन करते  पंडित महेंद्र पाल आर्य 
चेनारी(रोहतास)वैदिक धर्म महोत्सव में दूसरे दिन भी श्रद्धालुओं की काफी भीड़ उमड़ी हुई थी इस दौरान प्रातः काल मैं योगा सिखाया गया तत्पश्चात हवन का कार्य हुआ उसके बाद आर्य समाज के विद्वानों के द्वारा भजन एवं प्रवचन कहा गया दिल्ली से आए आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान पंडित महेंद्र पाल आर्य ने कहा कि क्या जाति वही होती जो आते-जाते भी नहीं आती. मानव समाज को जाती के नाम पर किस प्रकार एक दुसरे से दूर किया जा रहा है यह बहुत चिंता का विषय है.दुनिया बनाने वाले ने मानव मात्र का एक ही जाती बनाया है जिसे मानव जाती कहते हैं. मनु स्मृति में समानप्रसवत्मिका स: जाती बताया { अर्थात प्रसवकरने का तरीका जिनके एक हैं वह सब एक ही जाती कहलाती है } मानव मात्र का प्रसव होने का तरीका एक ही है जो मानव जाती कहलाती है | सभी मानव एक ही तरीके से मां के उदर से दुनिया में आते हैं कोई भी इन्सान दुसरे तरीके से धरती पर नहीं आया, और न आते हैं .यही कारण बना मानव मात्र को सिर्फ और सिर्फ मानव जाती कहा गया बताया गया है . 
फ़ोटो - हवन पर बैठे  श्रद्धालु 
किन्तु आज मानव उन्नति के शिखर पर है सब जगह हमारी तरक्की हो रही है या हम तरक्की करते जा रहे हैं, कहीं भी कोई पीछे नहीं रहना नहीं चाहता एक दुसरे को तरक्की में पीछे छोड़ कर आगे बढ़ रहे है, या बढ़ना चाहते हैं . परन्तु यह बात समझ में नहीं आती की जाती के नाम से मानव समाज को पीछे किस लिए धकेला जा रहा है ?
जब की जातीवाद का विरोध 1900 के प्रथम में था आज भी उसे दोहरा रहे हैं लोग, जबकी 1800 केअंतिम में इसका विरोध राजा राममोहनराय ने किया था . इसी जाती पांति को लेकर जिस दलित वर्ग के लोग, मनुस्मृति का विरोध किया,या किया जाता रहा है . क्या उस दलित वर्ग में आपस में जाती पांतिका भेद भाव टूटी है? क्या उनका आपसी छुआछूत पूरी तरह नष्ट हुआ ? यही कारण था डॉ0 भीमराव आंबेडकर ने अपने सत्य सनातन वैदिक धर्म को छोड़ कर बुद्ध मत को अपनाया .जब की अम्बेडकर को लिखने पढने से लेकर हर प्रकार की सहायता आर्य समाज के कार्यकर्ता व आर्य सिरोमणि नेता कहलाने वालों का रहा है. भारत से लेकर लंदन तक की पढाई में जिन्हें आर्य नरेश के नाम से पुकारा गया सयाजीराव गायकवाड़ जी ने1912 से1925 तक भीमराव आंबेडकर की उच्च विद्याविभूषित करने के लिए छात्र वृत्ति प्रदान की.व  लन्दन भेजा .आर्यसमाज के नेता राजर्षि शाहू महाराज भी अपना आर्थिक सहायता करते रहे यहाँ तक की लन्दन जाकर अपना सहयोग दिया . और भी कई आर्य नेताओं ने इन्हें हर प्रकार से सहाता की है .तथापि उन्हों ने सत्य सनातन वैदिक धर्म को छोड़ कर बुद्ध के शरण में चले गये. 
आज भी विवाह सम्वन्ध उनके आपस में नहीं होते, एक दलित दुसरे दलित को नीचा बता रहे हैं, दिखा रहे हैं आदि . अब हिन्दू में और बुद्ध में अंतर क्या है ?  जो हिन्दुत्व को छोड़ कर अम्बेडकर ने बुद्धिष्ट को अपनाया ? बुद्ध मुर्ति के विरोधी थे आज बौद्ध ही महात्मा बुद्ध और आंबेडकर की प्रतिमा की पूजा कर रहे हैं . हिन्दुओं की तरह बौद्ध सम्प्रोदय से मुर्तियों की पूजा नहीं हट पाई . फर्क इतना ही है की, हिन्दू अनेक मूर्तियों को पूजते हैं, और बोधिष्ट बुद्ध, और आंबेडकर की यह दोनों को पूजते हैं .हिन्दू दीप जलाता है, बौद्ध मोमबत्ती जलाते हैं, हिन्दुओं को केसरीरंग पसन्द है भारतीय प्रतिक होने के कारण . बुधिष्टों को नीला, हिन्दू केसरिया टोपी पहनता है, तो बुधिष्ट नीला टोपी पहनता है .हो सकता है बाह्य क्रियाओं में परिवर्तन हुवा परन्तु, पर मूल प्रवित्ति आज भी ज्यों का त्यों है . रंग बदले हैं पर अन्तर्मन नहीं बदला . आत्मा का काया कल्प नहीं हुवा . ऋषि दयानन्द औरअम्बेडकर के अपने अपने प्रयत्नों के बावजूद जातीगत भेद आज भी यथावत विद्यमान है . क्या यह शब्द ठीक नहीं है की,जाती वही होती है जो जाते, जाते भी नहो जाती ?

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