शारदीय नवरात्र : कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा के प्रथम रूप मां शैलपुत्री की हुई पूजा अर्चना, मंदिरो में मत्था टेकने के लिए उमड़ी भीड़

कैमूर लाइव न्यूज़ से बंटी जायसवाल 
# मंदिरो में टेका मत्था, पहले दिन उमड़ी भक्तो की भीड़
# गुंजायमान रहा वातावरण, विभिन्न प्रकार के पंडालो में देगी मां दर्शन 
भभुआ कैमूर। बुधवार से कलश स्थापना के साथ शारदीय नवरात्र शुरू हो गया। जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण इलाके में मां दुर्गा पूजा अर्चना धूमधाम से मनाया जा रहा है।शहर के सभी पूजा पंडालों में कलश स्थापना की गयी. इसके साथ ही सभी जगह मां दुर्गा की आरती शुरू हो गई। बुधवार को कलश स्थापना के साथ-साथ मां दुर्गा के शारदीय नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री व द्वितीया रूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की गयी। क्योंकि दूसरी तिथि का क्षय माना गया है। इस बार मां का आगमन चित्रा नक्षत्र में नाव पर हो रहा है और हाथी पर विदाई होगी।

# ऐसा है मां शैलपुत्री का स्वरूप
हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण हुआ शैलपुत्री। इनका वाहन वृषभ होने की वजह से इन्हें वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है।इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है।मां शैलपुत्री की पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता, इष्ट देव सहित योगिनियों को आमंत्रित कर कलश में विराजित किया जाता है। माता की चरणों में गाय का घी अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है और मन व तन दोनों ही निरोगी रहते हैं।

# मां ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी है। ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या करना और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली देवी ब्रह्मचारिणी मां के हाथों में अक्ष माला और कमंडल होता है। मां ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को ज्ञान, सदाचार, लगन, एकाग्रता और संयम का वरदान देती हैं। माता ब्रह्मचारिणी का भक्त अपने कर्तव्य पथ से नहीं भटकता और लंबी आयु का को प्राप्त करता है। मां ब्रह्मचारिणी का दूध, दही, घृत, मधु व शर्करा से स्नान कराएं और मां को फूल, अक्षत, रोली, चंदन आदि अर्पित करें। मां को पिस्ते से बनी मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद पान, सुपारी, लौंग अर्पित करें। मां अपने भक्तों को जीवन में सदा शांत चित्त और प्रसन्न रहने का आशीर्वाद देती हैं।

# भक्तिमय रहा वातारण

 शारदीय नवरात्र की शुरुआत होते हुए सुबह में जलयात्रा निकाल कर कलश स्थापना वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ स्थापित की विधि विधान से पूजा अर्चना के साथ हुई। वही श्रद्धालु भक्तो ने अपने घरो में भी कलश स्थापना कर मां दुर्गा की पूजा अर्चना करने में लगे है। पूजा पंडालो व शहर सहित गांवो में मां देवी दुर्गा की भक्ति गीत चारों ओर गूंज रहे है। चारो तरफ भक्तिमय वातावरण नजर आ रहा है। इसके बाद पंडालों में मां दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा शुरू हो गई। नवरात्र को लेकर पूरे कैमूर जिले में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है. जिला मुख्यालय एवं प्रखंड मुख्यालय सहित ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह मां दुर्गा की प्रतिमा रखकर दुर्गा पूजा की जा रही है। शारदीय नवरात्र की पूर्व बेला से ही सभी पंडालों एवं मंदिरों से बजे रहे भक्ति संगीत के स्वर ने पूरे  वातावरण को भक्तिमय बना दिया है।नवरात्र के समय किसी पूजा पंडालों में तो कहीं प्रोजेक्टर के माध्यम से रामायण, महाभारत जैसे धार्मिक सीरियल दिखाई जा रही है। पंडाल में दुर्गा सप्तसती का पाठ तो कहीं रामचरित मानस नवाह्न परायण पाठ का आयोजन किया गया है। जिले के नुआंव प्रखंड के नुआंव गांव में दुर्गापूजा के अवसर पर रामलीला, नाटक अथवा ड्रामा का मंचन शुरू हो गया है। 

# कई प्रकार के पंडाल में होगा मां का दर्शन

दुर्गा पूजा को लेकर सभी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है। जहाँ पंडाल व मूर्ति की तैयारी में थोड़ा काम बाकी है उसे सप्तमी से पहले पूरा करने में कारीगर व मूर्तिकार दिन रात एक किये हुए है। शहर के एकता चौक,जायसवाल दुर्गा मंदिर,व्यवसायिक संघ, पटेल चौक, शिवाजी चौक आदि स्थान पर भव्य रूप से पूजा की तैयारी व सजाया गया है।

# मंदिरो में मत्था टेक हुई पूजा अर्चना 

जिले के भगवानपुर प्रखंड स्थित प्राचीन मां मुंडेश्वरी धाम में शारदीय नवरात्र के पहले दिन श्रद्धालु भक्तो में मां के दरबार में मत्था टेक कर पूजा अर्चना की। वही शहर सहित गांव के मंदिरों में सुबह में स्नानादी कर पूजा अर्चना किया गया। मंदिरो में सुबह से ही भीड़ लगनी शुरू हो गयी थी। मंदिरो में सुबह में मां की भव्य तरीके से आरती की गई। 

# पूजन विधि : नवरात्रि के पहले दिन स्नानादि आदि से निवृत होकर व्रत का संकल्प किया गया। संकल्प लेने के बाद मिट्टी की विधि बनाई जाती है, जिसमें जौ(जयंती) बोया जाता है। साथ ही कुल देवी की मूर्ति स्थापित की जाती है, जिसके बाद उसकी पूजा की जाती है। पूजा के साथ ही दुर्गा सप्तशती का पाठ एवं अखंड दीप जलाया जाता है। यह अखंड दीप अगले 9 दिनों तक जलता रहना चाहिए। माता की पूजा बिना मंत्र एवं साधना के अधूरी मानी जाती है, इसलिए इन 9 दिनों में तंत्र और मंत्र के कार्य भी किए जाने चाहिए। तंत्र-मंत्र विद्या में रुचि रखने वाले इंसान के लिए यह काफी अच्छा समय है। अगर आप सुख-शांति चाहते हैं तो इसके लिए किसी ना किसी ग्रह की उपासना करनी चाहिए ऐसा शास्त्रों में भी लिखा हुआ है।

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