बाबा मन्नते करते है पूरी, सुविधाओं का है अभाव
कैमूर(बंटी जायसवाल)/चेनारी(रोहतास) : झारखंड बंटवारे के बाद शेष बिहार में बचे गिने-चुने प्राकृतिक शिवलिंगों में शुमार रोहतास जिला के गुप्तेश्वर धाम की गुफा में स्थित भगवान शिव की महिमा की बखान आदिकाल से ही होती आ रही है. कैमूर की प्राकृतिक सुषमा से सुसज्जित वादियों में स्थित इस गुफा में विराजमान गुप्तेश्वर महादेव का जलाभिषेक करने के बाद भक्तों की सभी मन्नतें पूरी हो जाती है. शास्त्रों के अनुसार, कहा जाता है कि एक असुर भेकासुर, भगवान शिव का घोर तपस्या करने लगा. तपस्या करते हुए भगवान शिव को खुश करने के लिए उसने अपना एक हाथ तलवार से काट दिया और इसके बाद फिर उसने सिर धड़ से अलग करना चाहा तभी भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गए. इसके बाद भगवान शंकर ने खुश होकर भेकासुर का कटे हाथ को जोड़ते हुए उससे वरदान मांगने के लिए कहा. इसपर भेकासुर ने भगवान शिव से किसी भी व्यक्ति को भस्म करने की वरदान मांगी. इसके बाद महादेव ने वरदान देकर उसे भेकासुर से भस्मासुर का नाम दे दिया. फिर क्या था भस्मासुर जहां भी जाता उसे भस्म करने लगा. अपना आतंक फैलाने लगा. लोग त्राहि त्राहि करने लगे. एक दिन भस्मासुर कैलाश पर्वत पर पहुँच गया. जहां भगवान शिव व पार्वती बैठे थे.
भस्मासुर मां पार्वती के सौंदर्य पर मोहित होकर शिव से मिले वरदान की परीक्षा लेने उन्हीं के सिर पर हाथ रखने के लिए दौड़ा. जहां से भागते हुए भगवान भोले कैमूर पहाड़ी की गुफा के गुप्त स्थान में छुप गए थे. भगवान विष्णु ने भस्मासुर का शिव से पीछा छुड़ाने के लिए मोहिनी का रूप धारण कर लिया. इसके बाद बीच रास्ते में भगवान विष्णु ने उसे अपने मोहिनी रूप से रोक लिया. इसके बाद उन्होंने कहा कि भगवान भोलेनाथ तो इस तरह नृत्य करते है अगर तुम ऐसा माथे पर हाथ रख कर नृत्य करोगे मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं. फिर यह सुन कर भस्मासुर ने भगवान शंकर की नृत्य करते करते माथे पर अपना हाथ रखा और जल कर खुद भस्म हो गया. इसके बाद गुफा के अंदर छुपे भोलेदानी बाहर निकले.
इतिहास में भी है वर्णन
शाहाबाद गजेटियर में दर्ज फ्रांसिस बुकानन नामक अंग्रेज विद्वान की टिप्पणियों के अनुसार, गुफा में जलने के कारण उसका आधा हिस्सा काला होने के सबूत आज भी देखने को मिलते हैं.
लोगों बताते हैं कि विख्यात उपन्यासकार देवकी नंदन खत्री ने अपने चर्चित उपन्यास 'चंद्रकांता' में विंध्य पर्वत श्रृंखला की जिन तिलस्मी गुफाओं का जिक्र किया है, संभवत: उन्हीं गुफाओं में गुप्ताधाम की यह रहस्यमयी गुफा भी है.
सावन में लग रहा कांवरियों का मेला, करते बाबा पर जलाभिषेक
एक साल में गुप्ताधाम में पांच बार से अधिक मेला लगता है. महाशिवरात्रि के अवसर पर गुप्ताधाम में देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु पवित्र शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए आते हैं और सावन में एक महीना तक बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल से हजारों शिवभक्त यहां आकर जलाभिषेक करते हैं. बक्सर से गंगाजल लेकर गुप्ता धाम पहुंचने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है. यहां पर कांवरियां पहुँच कर बाबा को जलाभिषेक करते है. यहां बाबा से मांगी गयी सभी मन्नते पूरी करते है. इस गुफा में आज भी उनके शिवलिंग पर ऊपर से पानी टपकता है. इस पानी के टपकने से गुफा में पानी पानी भी हो जाता है.
#लाइट(टॉर्च) जरूर रखे अपने साथ
अगर आप गुप्ताधाम जाना चाह रहे है या आप जा रहे है तो अपने साथ लाइट( टॉर्च) जरूर लेकर जाए. ताकि अंधेरे में गुफा में जाने में परेशानी न हो.
यहां सुविधाओं का है अभाव
गुप्ताधाम में सावन महीने में एक माह तक श्रावणी मेला लगता है. हर सोमवारी को हजारो कांवरियां द्वारा गुफा में विराजमान भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है. लेकिन यहां पर कांवरियां श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का कफी अभाव है. जिससे कांवरियां व श्रद्धालू भक्तों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. फिर भी इन परिस्थितियो को सह भी बाबा कर दर भक्त पहुँचते है. यहां धर्मशाला और कुछ कमरे अवश्य बने हैं, परंतु अधिकांश जर्जर हो चुके हैं. यहां पीने के पानी, रास्ते, लाइट, शौचालय आदि की कमी है. जिसे सरकार व जनप्रतिनिधियों को पूरा करवाना चाहिए. ताकि भक्तो को परेशानी न हो.
गुफा में ऑक्सीजन की रहती है कमी
बाबा के रहस्यमयी गुफा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है. जब हजारों श्रद्धालुओं व कांवरियों की भीड़ गुफा में जलाभिषेक के लिए लगती है तो सांस लेना मुश्किल हो जाता है. गुप्ताधाम गुफा के अंदर ऑक्सीजन की कमी से साल 1989 में हुई आधा दर्जन से अधिक श्रद्धालुओं की मौत गयी थी. इसके बाद यहां प्रशासन द्वारा ऑक्सीजन की कुछ सिलेंडर की व्यवस्था करायी जाने लगी. वही गुप्ताधाम कमिटी के लोगो द्वारा यहां पर लाइट आदि की व्यवस्था करायी जाती है. ताकि किसी भी प्रकार की परेशानी न हो.
गुप्ताधाम के बाद मां मुंडेश्वरी का दर्शन करते है कांवरियां
सावन माह में गुप्ताधाम में बाबा का जलाभिषेक करने के बाद दूसरे राज्यो व जिलों से आने वाले कांवरियां व श्रद्धालु कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ गांव के पवरा पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मां मुंडेश्वरी का दर्शन करते है. यहां माता के गर्भगृह में स्थित महामंडलेश्वर महादेव चतुर्भुजी शिवलिंग पर जलाभिषेक भी करते है.
क्या कहते है लोग
बैरिया गांव के प्रो़फेसर उमेश सिंह बताते हैं कि इस घटना के बाद ही प्रशासन की ओर से यहां कुछ ऑक्सीजन सिलेंडर भेजा जाने लगा था.प्रशासन की ओर से चिकित्सा शिविर भी लगता था, लेकिन वन विभाग इस क्षेत्र को अभ्यारण्य घोषित किए जाने के बाद प्रशासनिक स्तर पर दी जा रही सुविधा बंद कर दी गई है. अब समाजसेवियों के सहारे ही इतना बड़ा मेला चलता है.
इस तरह पहुँचे गुप्ताधाम
कैमूर की पहाड़ी पर गुफा में विराजमान बाबा गुप्तेश्वर महादेव यानी गुप्ताधाम पहुँचने के लिए दो से तीन रास्ते है. कैमूर जिले के एनएच दो(नेेेशनल
हाइवे) से कुदरा से लगभग 25 किमी की दूरी पर चेनारी होते हुए उगहनी घाट पहुँचते है. यहां से फिर दुर्गम पहाड़ी की चढ़ाई, नदियों को पार करते हुए पहुँचते है. इसके अलावा दूसरा रास्ता सासाराम के तरफ से मां ताराचंडी धाम के पास पनारी घाट होते भी पहुँचते है. इसके अलावा दुर्गावती जलाशय के बगल से गुजरे रास्ते से जंगलो व पहाड़ो नदियों को पार करते हुए जाना पड़ता है. बरसात के दिनों में इस रास्ते से नहीं जाते है. ज्यादातर लोग उगहनी व सासाराम पनारी घाट वाले रास्ते से पहुँचते है.
काफी दुर्गम हैं रास्ता जिला मुख्यालय सासाराम से 65 किमी की दूरी पर स्थित इस गुफा में पहुंचने के लिए रेहल, पनारी घाट और उगहनी घाट से तीन रास्ते हैं जो अतिविकट व दुर्गम हैं। दुर्गावती नदी को पांच बार पार कर पांच पहाड़ियों की यात्रा करने के बाद लोग यहां पहुंचते हैं.
क्या कहते है कमिटी के अध्यक्ष
कमिटी के अध्यक्ष गोपाल सिंह खरवार ने बताया कि अगर सरकार गुप्ताधाम को पर्यटक से जोड़ देती है तो यहां पर लाखों श्रद्धालु गुप्ताधाम में आएंगे. जिस तरह बाबा बैजनाथ धाम में मेला लगता है.उसी तरह गुप्ता धाम में भी सालों भर श्रद्धालुओं का आना जाना रहेगा. सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं को दिक्कत आने में होती है. यहां सड़क मार्ग नहीं है. धाम परिषद में धर्मशाला जो कई वर्ष पहले बनाया गया था वह भी जर्जर अवस्था में है. शौचालय का भी निर्माण नहीं कराया गया है. इसके लिए जिलाधिकारी से लेकर प्रखंड विकास पदाधिकारी तक आवेदन दिया जा चुका है.
क्या कहते है सीओ
चेनारी अंचलाधिकारी रविंद्र कुमार ने बताया कि वन सेंचुरी लागू होने की वजह से वहां पर कुछ नहीं किया जा सकता है. जब भी सरकार के द्वारा कुछ वहां पर बनवाने के लिए प्रावधान बनाया जाता है तो वन विभाग के द्वारा अड़चन लगा दिया जाता है.





